ख़ामोशियाँ ही बेहतर है

डॉ. विभाषा मिश्र की एक रचना पढें जो कहती हैं कि खामोशी ज्यादा अच्छी होती है।

दूर-दूर तक कोई तो हो
सुनने वाला जिसके लिए
मेरी बातों का कोई
मतलब भी निकलता हो
कोई तो हो जिसे सिर्फ़
मेरी बातें सुनना पसंद हो
अगर कोई नहीं दूर-दूर तक
तो इससे अच्छी तो मेरी
ख़ामोशियाँ ही हैं जिसके सहारे मैं
कम-से-कम ख़ुद से दो-चार बातें
कर लिया करती हूँ
कभी-कभी ख़ामोश रहकर भी ऐसा लगता है
जैसे इस लंबी ख़ामोशी के बाद
जब बातचीत का सिलसिला शुरू होगा
तो क्या कुछ भी कहने के लिए किसी नए शब्द
को तराशने की ज़रूरत पड़ेगी
शायद हाँ!
क्योंकि ख़ामोशियों ने तो
अनगिनत प्यार भरे शब्दों को
अपने भीतर ही दबाकर
वही-कहीं दफ़न कर दिया है
अब किसी भी बातचीत का
कोई अर्थ ही नहीं
इसलिए अब सचमुच लगने लगा है
कि ख़ामोशियाँ ही बेहतर है।

~ डॉ. विभाषा मिश्र


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