निगल गया वो मजदूरों को

औरेया हादसे में मारे गये सभी मजदूर भाइयों को भावभीनी श्रद्धांजलि

बीमारी का संकट था फैला काम का पड़ गया टोटा था,
जिंदगी मानो ठहर गई थी घर मे सबको रोका था।
जिनके घर थे ठहर गए वो पर उनके लिए वो धोखा था,
रोज कमाते रोज थे खाते प्राणों को ऐसे ही रोका था।
पेट की आग लगी सताने याद गाँव की आयी थी,
निकल पड़े वो एक साथ थे लगी इसी में भलाई थी।
रात गुज़र रही चिंता में थी सब एक साथ ही बैठे थे,
चाय पीने उतरे थे कुछ, कुछ एक गाड़ी में लेटे थे।
रात आखिरी उनकी थी ये कोई जान ना पाया था,
एक अनियंत्रित वाहन चालक काल बन कर आया था।
निगल गया वो मजदूरों को जाने कौन कहाँ का था,
कोई किसी का पिता वहाँ था कोई किसी का बेटा था।
बीमारी से शायद बच जाते उन्हें मजबूरी ने मारा था,
उनके साथ साथ ही उनके प्रियजनों को भी संहारा था।

~ शंकर फ़र्रुखाबादी


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