पेट पालने की मजबूरी

औरंगाबाद ट्रेन हादसे में मारे गए सभी मज़दूर भाइयों को भावभीनी श्रद्धांजलि….

गाँव मे नहीं था रोजगार का कोई भी साधन,
चला गया था दूर शहर मैं लेकर अपने प्रियजन।
दिन भर मजदूरी करता था पैसे चार कमाता था,
हर शाम थक हार कर मैं रूखा सूखा ही खाता था।
घर पर मेरी पत्नी बूढ़ी माँ का ख्याल रखा करती थी,
बूढ़े पिता की जिंदगी मेरे बच्चों के साथ गुज़रती थी।
छोटा भाई भी साथ मेरे मजदूरी ही करता था,
सहारा मुझ को देता था साथ मेरे ही रहता था।
कमा कमा कर सारे पैसे घर को भेजा करता था,
घर पर हरदम कुशल रहे बस यही सोचा करता था।
दिहाड़ी जिस दिन नहीं थी मिलती भूखा ही सो जाता था,
माँ पापा पत्नी बच्चों की यादों में मैं खो जाता था।
एक समय ऐसा आया बीमारी ने विश्व को घेर लिया,
क़ैद हो जाओ घर में सब लोगों ने ऐसा हुक्म दिया।
आमदनी थी बंद हुई खाने के पड़ गए लाले थे,
इधर चिंता पेट की थी उधर चिंता मे घर वाले थे।
घर आ जाओ बेटा फोन पे बार बार माँ कहती थी,
बस ट्रेन घोड़ा गाड़ी पे शासन की पाबंदी थी।
भूखे रहते थे दिन दिन भर अन्न का कहीं नाम ना था,
गांव के किसी भी साथी पर कहीं कोई भी काम ना था।
पेट की आग घर की चिंता ने था दिल को सता दिया,
पैदल घर को जाने का हम सब ने था मन बना लिया।
कई कोसों तक जाना था हम सारे चलते जाते थे,
भूखे प्यासे एक आस लिये हम आगे बढ़ते जाते थे।
चलते चलते थक जाते थे तो बैठ कहीं सुस्ताते थे,
घर पहुंचने की आस लिए हम फिर आगे बढ़ जाते थे।
काल का चक्र नहीं था मालूम एक पटरी पर थे लेट गये,
ट्रेन बसें तो बंद हैं सारी ये सोच के हम वहाँ बैठ गये।
छोटा भाई भी बाजू मे आकर था थक के लेट गया,
इसी समय भाग्य हमारा जीवन रेखा को मेट गया।
बस ट्रेनों के ना चलने का फरमान हमने सुन रक्खा था,
पटरी तो अब खाली ही रहेगी हुआ हमें ये धोखा था।
थके हुए थे हद से ज्यादा झट से नींद ने घेरा था,
उसी समय यमराज ने आकर डाला वहाँ पर डेरा था।
एक माल गाड़ी आयी थी कुचल के हमको निकल गयी,
हम लोगों के साथ हमारे परिवार को भी निगल गयी।
साँस छूटती जाती थी माँ का चेहरा ना भूलता था,
बच्चों का चेहरा जो याद करूँ दिल और जोर से फूलता था।
इंतजार कर रहे घर वाले कोई खबर उन्हें तो दे देना,
हम मझधार मे उनको छोड़ गए भगवन उनकी रक्षा करना।

~ शंकर फ़र्रुखाबादी


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