मजदूर का दर्द

सोचा नही था कभी ऐसा दिन भी आयेगा,
जेल छोड़ घर ही कैदखाना बन जायेगा।

मजदूरी करके जब शाम को लौटकर आता था
अपने दोस्तों के साथ चाय पीने जाता था
दिनभर के थकान उस पल में भूल जाता था
एक दूसरे के दर्दो का साथी बन जाता था

सोचा नही था कभी साथ इस तरह छूट जायेगा,
अपने भी अपनो से इस तरह रूठ जायेगा।

मजदूरी करके जब शहर से लौटकर गाँव आता था,
पड़ोस के चाचा-चाची सब से मिलने जाता था
अपने पड़ोस के बच्चों में टॉफ़ी बटबाता था
बच्चों के मुस्कान देख खुदभी मुस्कुराता था
बरसों के दुख-दर्द आते ही भूल जाता था

सोचा नही था कभी ऐसा दिन भी आयेगा,
शहर और गाँव दोनो हमसे रूठ जायेगा।

~ सिकंदर शर्मा


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