चलती साँसे

पूजा कुमारी साव इस कविता में जिंदगी और साँसों की चर्चा करती हैं। साँसें चल रही है और यह जिंदगी भी आगे बढ़ रही है।

जब तक साँसे चलती है,
ये सांसे गर्म होती है
शरीर और मस्तिष्क, बुध्दि
अभी, मैं मरा नहीं
कहता है, बीमार व्यक्ति
अभी साँसे, चल रही है
मैं सोच, पाता हूँ
आँखे देख रही हैं
और साँसों की आवाज
कर्ण तक पहुँच रहा है।

सब कुछ वैसा ही चल रहा है
पूरी पृथ्वी, बस शरीर
अस्वस्थ है, थका हुआ है
नासाज यही है
आत्मा नहीं
अब भी आत्मा है मुझमें
कहता है वह भोगता हुआ व्यक्ति।

भोगना यानी जीना, अनुभव करना
उस बीमारी को, जो उस पर राज करता है
पर, वो जिंदा है यह भी इक्तला करता है
पर, बीमार व्यक्ति की सांसे
खुद से, बातें करती हैं
कि, मैं चल रहा हूँ
इस शरीर में अभी ऊष्मा है
कुछ करने की, बहुत कुछ करने की
इच्छा प्रबल,
मैं चलूँगा, ये ठीक रहेगा
ये मेरी आवाज से जीवित रहेगा
सपनों को पूरा करेगा,
वो जीवित, आदमी
पर, बीमार आदमी।

अब भी सोचता है कि
मुझमें गर्म रक्त का प्रवाह अब भी है
अब भी शक्तिशाली हूँ
शरीर हमारा अस्वस्थ है
इच्छाशक्ति होनी चाहिए हममें
वही हमें जिलाती है जिंदा रखती है।

~ पूजा कुमारी साव


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