यह भी कोई जीवन है क्या

यह भी कोई जीवन है क्या

बाधाओं में घिर घबराना,
संघर्षां में पीठ दिखाना,
एक-दो ठोंकर बस रूक जाना,
यह भी कोई जीवन है क्या।

पल-पल चलना, चलते रहना,
मंजिल के पथ बढ़ते रहना,
पर आलस कर बस सो जाना,
यह भी कोई जीवन है क्या।

फूलों खिलना और मुस्काना,
बड़ी शान से कूंज महकाना ,
पर कांटों से डर झूक जाना,
यह भी कोई जीवन है क्या।

~ मुकेश बोहरा अमन

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