Category: COVID19
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आजादी की हवा
और कब तक कैद रहेंगे हम? आज अहसास हो रहा है, पिंजरों में बंद पंछियों का मर्म, महसूस करते हो उनकी छटपटाहट? अब करो, कैद होने का दर्द क्या होता है, जानों सच ही कहा है किसी ने, जा तन बीते वा तन जाने सोचो तो, वो अपना दर्द किसी से कह भी तो नहीं…
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कहां खो गया खुशियों का संसार
कहां खो गया यह खुशियों का संसार नहीं कोई सुनता है उस दिल की पुकार जिन्होंने जोड़े तेरे दर पे दोनों हाथ माथा भी टेके तेरे द्वार तेरे ऊपर किया पूर्ण विश्वास दिया तुझे ऊंचा सम्मान कहां खो गया यह खुशियों का संसार मानव निर्मित पत्थर की मूरत को माना है अपना भगवान फिर भी…
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कोरोना चाइना का
चाइना तेरे कोरोना ने, ये क्या दहशत फैलाई है। याद रख परास्त करने की, हमने भी कसमें खाई है।। तेरे कोरोना सा इस जग में, दूजा कोई शैतान नहीं । हम ठोकर मार पछाड़ेंगे, रहेगा नामो निशान नहीं। इस वायरस की जड़ें हिलाने हमने फौजें लगाई है, याद रख परास्त करने की हमने भी कसमें…
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थोड़ी दूरियां बढ़ा लें
कितना हाहाकर है सितम ढाने को जो जन्मा है लाइलाज़ कोरोना! सक्षम है, नष्ट कर देने को समस्त मानव जाति। चिंतित है सम्पूर्ण विश्व इस भयावह स्थिति से बस आशा की एक किरण है सोसल डिस्टेनसिंग तो आओ, आज थोड़ी दूरियां बढ़ा लें अपनों से, अपनों के लिए। ~ अमित कुमार चौधरी
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प्रलय
कह गये राम सिया से- ऐसा कलयुग आयेगा, सांस-सांस पर टैक्स लगेगा, बस लट्ठों का उपहार मिलेगा। भोजन का अम्बार तो होगा, पर दाने-दाने को मनुज तरसेगा। भीषण महामारी में भी भ्रष्टाचार पनपेगा। सांपों में जहर न होगा पर आदमी जहर उगलेगा। रक्षक भक्षक बन जायेंगे झूठा देशधर्म का पाठ पढ़ायेंगे। सारे चोर-लुटेरे … भारत…
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मैं मजदूर हूँ
कोरोना जैसी वैश्विक महामारी में आज हर कोई असुरक्षित महसूस कर रहा है। लोगों को घर में ही स्वयं को कैद होने और अपनो से दूर रहने को विवश होना पड़ा है। आज इस महामारी से अपने देश में अगर कोई वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है तो वो है मजदूर वर्ग। कारखाने-मीलें सब बंद…
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मैं मजदूर
मैं मजदूर फौलादी इरादों वाला चुटकियों में मसल देता भारी से भारी पत्थर चूर-चूर कर देता पहाड़ों का अभिमान मेरे हाथ पिघला देते हैं लोहा मेरी हिम्मत से निर्माण होता है ऊँची इमारतों का मेरी मेहनत से बाँध देता हूँ नदियों को मैं मजदूर मजबूत हौंसलों वाला चीर कर रख देता सागर का सीना भी…
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जिंदगी सड़को पर बेहाल पड़ी है
जिंदगी सड़को पर बेहाल पड़ी है। जो बिना सुख सुविधा के खुश रहा करते थे आज सड़को पर इन्तहां दे रही हैं। जो भड़ता सभी का पेट यहां-वहां पर, आज तड़पते गां जा रही हैं कुछ सपनों की चाहत में, अपनो को छोड़ आसमा उड़ी थी आज सड़को पे बेहाल पड़ी हैं। देखने हो अग़र…
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देश लड़ रहा है
देश लड़ रहा है हम जरूर जीतेंगे, कोरोना जैसी महामारी से, हर वो इंसान कोरोना योद्धा है जो अपने परिवार को बचा रहा है, देश लड़ रहा है, हाथ मिलाने व गले मिलने की परंपरा अब खत्म हो रही है, मानो ऐसा लग रहा है जैसे हम सब पुराने समय में पहुँच चुके है। देश…
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मानवता के शत्रु
कुछ दिन पहले यह समाचार पढ़ कर मेरा मन द्रवित ह़ो गया कि मजदूरो ने आगरा से लखनपुर तक पहूंचने का भारी भरकम किराया अदा किया क्या इंसान अपनी इंसानियत खो चुका है कि इस त्रासदी मे भी लूटपाट और उनकी मजबूरी का फायदा उठा रहा है धिक्कार है ऐसे नरभक्षियों पर इसी बिषय पर…
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स्वदेशी हम अपनाएँगे, देश भक्त कहलाएँगे
ये दौर अभी कुछ ऐसा है, अब खुद पे भरोसे जैसा है, ये मौक़ा मिला है हम सब को, अपना कुछ हुनर दिखाना है, विदेशी समान तिरस्कृत कर, उनको अब पीठ दिखाना है, अपने आन्तरिक जज़्बातों को, कुछ ऐसी राह दिखाएँगे, स्वदेशी हम अपनाएँगे, देश भक्त कहलाएँगे। अपनी शक्ति को पहचानो, अपने विवेक से काम…
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मजदूर- राष्ट्रनिर्माता
मजदूर हैं भले वो मजबूर बो नही है गलती है रोटियों की मगरूर वो नहीं है मरते है वो सड़क पर सरकारी आंकड़ों में देकर के चंद पैसे भिखमंगे वो नही है हर अमीर से छले वो पैदल ही तो चले वो मंजिल है दूर कितनी लेकिन तो क्या करे वो है आस जिनसे उनकी…
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मैं एक मजदूर हूं
मैं एक मजदूर हूं मैं ठोकर खाने को मजबूर हूं दो रोटी पाने की चाह में मैं घर परिवार से दूर हूं जी हां मैं एक मजदूर हूं सरकारें आती रही जाती रही कठिनाइयां हमारी और बढ़ाती रही अपनी आउंछी राजनीति के लिए मोहरा हमे बनाती रही मुद्दाओं में भटकने को मैं मशहूर हूं जी…
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प्रवासी मजदूर
देख पीड़ा श्रमिक की मन रहा है डर स्याह हर उम्मीद है जाए तो किस दर रेल की पटरी हो या हो कोई सड़क हो रक्त रंजित चीखती है सभी डगर धैर्य की भी सीमा, होती है संसार में पार उसके पार करलूँ कैसे ये सफर पीड़ा उनकी आज साहिब जरा सुनो चिलचिलाती धूप है…
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जवाब वक्त को देना होगा
जवाब वक्त को देना होगा सच को तुमको लेना होगा आह लगेगी मजदूरों की तब तुमको हिसाब देना होगा जवाब वक्त को देना होगा हर तरफ मौत का मातम है प्यासा भूखा है हर कोई चलने को मजबूर है लेकिन नही यहाँ पर साधन कोई डरता है ये देख के वो भी पर खतरा अब…
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सड़क और मजदूर
सड़क कहती मजदूर से तुम मेरे साथी हो जिस प्रकार साथ निभाया है ये लाइट पोल और ठीक तुम्हारे बगल वाली नाली चलो तुम भी परमामेन्ट हो जाओ ठीक एक दाद और खुजली की तरह मजदूर ने अपनी आँखों से एक आँख निकालकर कहा- “आखिरकार कब-तक? एक सरकार की तरह मैं भी अनियंत्रित रहूंगा…” कभी…
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आत्मनिर्भरता
छोड़ आसरे गफलत के खुद को मज़बूत बनाना है। स्वावलंबी बन करके, खुद आत्मनिर्भर कहाना है।। गैरों के कंधों पर अपनी, बंदूक नहीं रखना सीखे! खुद की मेहनत से ही, खाना, जीना, रहना सीखे!! जिम्मेदारी और परिश्रम से, हर पथ अब चमकाना है। स्वावलंबी बन करके, खुद आत्मनिर्भर कहाना है।। भाग्य भरोसे बैठे कायर, उठो…
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मजदूर के विचार
अपने अंतःकरण में जिज्ञासाओं का बोझ लिए हुए मैं चले जा रहा हूं खुद में खुद की सोच लिए हुए महामारी के दरमियां जीने की सारी उम्मीदें खोकर मैं खुद के आंसू पोछने लगा, अपनी आंखों से रोकर जब सोच रहा था मैं कि मेरा जन्म ही क्यों हुआ तभी मेरी पीठ पर सवार मेरी…
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मेरे हिस्से में
क्या मिला मेरे हिस्से में, बताऊगां बच्चो को किस्से में। मै कितना मजबूर था? क्यो कि मै मजदूर था। हर रोज नया तमाशा था, मन में मेरे भी आशा था। मिल जायेगी सहयोग हमे, खुशिया होंगी मेरे भी घर में जब वो ऐलान किये, मन में मेरे कई फूल खिले। पर ये तो सारे वादे…