एक शख़्स

कलमकार स्वयं को नादान कलम कहते हैं। इस कविता में वे वादियाँ, बर्फ़ का पानी और नादान कलम की कहानी लिख रख रहे हैं।

वो पूछती थी मैं बताता था
जिन्दगी को दर्द जिन्दगी के सुनाता था।
वो मुस्कुराती थी मंद मंद
और मैं शर्माता था।
इसी तरह गमों को अकेले अकेले हराता था
तस्वीर बनाता और फिर उसे मिटाता था।
राग कोई नया लबों पर लाता था
मत पूछो उस वृक्ष के तले कितने को हंसाता था।
वो कन्याओं का चारों तरफ़ का घेरा
कितना खूबसूरत था स्कूल का वो दौर मेरा।
वो उसका छिप छिप के मेरे विद्यालय पहचान पत्र को ताकना
मन में उसके भी प्रेम की मटकी मेरे लिये पकना।
दिन भर दौड़ना प्रांगण में
पैरों का वो मेरे कभी न रूकना।
याद है हर शनिवार को वो हाॅउस मिटिंग का शोर
मन्त्री भाई की शायरी चलती चारों जब चारों ओर।
खुशियाँ बचपन में मिलकर बांटना
चेष्टा न कर तुम्हारा हमें फिर डांटना।
याद है नादान कलम को वो पानी के नलके
झुकाये रक्ख़ते थे जहाँ तुम अपनी पलकें।
बीत गया एक दौर कुछ ऐसे
शब्दों में बयां करूं अब कैसे।
पुष्प पर मंडराता है भंवरा जैसा
ये शख़्स था वो मेरे लिये पागल कैसा।
समझ न सके जै़हन की बातों को
चांदनी रात में टिमटिमाते तारों की रातों को।

~ खेम चन्द


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