मन की व्यथा

हमारा मन अनेक तरह की भावनाओं को समझता है और प्रकट भी करता है। हमारे उदास होने पर मन की दशा हमारे जीवन से जुड़ी होती है। कलमकार ऋतिक वर्मा – मन की व्यथा, पढ़िये।

आज बैठा हूं
एकांत को मौन हुए
मन विचलित सा है,

मानों भीतर
मन किसी व्याकुलता से
घीरे हुए हैं,

ऐसा प्रतीत होता है
दोस्तों संग बिताए
कुछ यादगार लम्हों से
नाता टूटा है,

सूख-दुःख में रहने वाले
मौज मस्ती औऱ थोड़ी नादानियाँ
करने वाले
कुछ अपनों का हाथ छूटा है,

छोड़कर एक शहर
दूसरे शहर को चला हूं,
एक पल को आगे कुछ
पाने की चाहत लिए
चेहरे पर मुस्कान आती है,

वही पीछे पलट कर देखता हूं
तो पुराने रिश्ते-नातों-
की याद सताती है,

शायद अब गाँव भी
जल्दी से नसीब न हो,
काहे की अब
गाँव से कोसों दूर चला हूं,

जब तक सपनें पूरे नहीं हो जाते
माता पिता व सारे अपनों से
फ़ोन पर करता रहूंगा बातें,

चरण स्पर्श तो न कर
पाऊंगा उनकी
पर सबकी दुवाएँ
रहेंगी हमेसा मेरे माथे,

गाँव ये मेरा
बचपन के लम्हों से नाता टूटा है,
बिछड़ के लोगों से
कुछ अपनों का हाथ छूटा है,

काहे की
भुला के गाँव अब
मैं शहर को हो चला हूं,

छोड़ के घर अपना
राही रहगुज़र का हो चला हूं।

~ ऋतिक कुमार वर्मा


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