कलमकार खेम चन्द का मानना है कि जीवन का हर दिन बड़े-बुजुर्गों की सेवा में अवश्य बीतना चाहिए। हमारे माता-पिता को वृद्धावस्था में कष्ट मिले तो जीवन व्यर्थ ही समझो। परिवार में बड़े बूढ़े लोगों का सदैव आदर होना चाहिए।
लेकर आया हवा का झरोखा नया फ़रमान,
ढल गयी जिन्दगी की एक और शाम।
खाली से लगने लगे मुझे
गाँवों के वो पुराने वाले आलीशान मकान,
बदल गया आज फिर एक इंसान।
माँ-बाप से बहु-बेटे रहते थे परेशान,
बेच दी इंसानियत
न जाने कौन सी थी वो उस चौराहे पे दुकान।
क्यों बेचता है इंसान तु अपना ईमान,
न बन खुद भगवान।
गर्मी और सर्दी से बचाते थे जो,
कहाँ छोड़कर चले गये आज वो।
रोशनी भी आँखों की कम पडने लगी,
दो सहारा माँ-बाप को बुढापे में ये बात अभी तक नहीं जगी।
वक्त रोज बदलता रहेगा
बीते जो अंतिम पल कैसे दादा-दादी के,
कैसे अपने बच्चों से कहेगा।
कुछ अफसोस मन में तेरे भी रहेगा,
याद रखना समय की धार में वक्त अच्छा तेरा भी बहेगा।
घर से दूर वृध्दावस्था को कैसे सहेगा,
अश्रु आँखों से अकेले में बहेगा।~ खेम चन्द
हिन्दी बोल इंडिया के फेसबुक पेज़ पर भी कलमकार की इस प्रस्तुति को पोस्ट किया गया है।
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