भरत मोह

भरत जैसा चरित्र आजकल देख पाना संभव न होगा। कलमकार अमित मिश्र ने भरत से जुड़े तथ्यों को अपनी रचना में प्रस्तुत किया है।

मुझको सिंहासन, श्री राम को वनवास दिया
पुत्र मोह में माँ तुमने, ये कैसा अन्याय किया।
किया कलंकित मुझको तू, जग क्या सोचेगा
राज सुख पाने की खातिर, मैंने ही कपट किया।

नहीं चाहिए राज पाट, नहीं चाहिए सिंहासन
इच्छा नहीं राज पाने की, सबको मैं बोलूंगा।
हाथ जोड़ कर भैया को, वन से वापस लाऊंगा
राज तिलक कर फिर से,उनको राजा बनाऊंगा।

चल दिए श्री राम को लाने, गुरू,मंत्री, जन संग
हुए अचंभित अयोध्या वासी, देख अनोखा रंग।
विचलित हुए उपस्थित जन, देख कर प्रेम प्रसंग
डूब रहे थे हर कोई, जब बहने लगा प्रेम तरंग।

संसय हुआ लक्षमण को, देख भरत को वन में
राज्य हड़प कर आया मारने, बात यही थी मन में।
आज्ञा दो भैया मुझको, मारूँ बाण इसके तन में
राम कहे पहले तुम समझो, क्या है उसके मन में।

गिरे भरत प्रभु के चरणों में, अश्रु लिए नयनों में
हाँथ जोड़ कर करे निवेदन, लौट चलो प्रभु घर में।
राज्य सिंहासन है तुम्हारा, तुम ही बसे जन जन में
लौट चलो अपने नगर में, खुशियाँ झूमेगी आंगन में।

आप रहें ॠषि भेष वन में, कैसे बैठूँ मैं सिंहासन
श्री रामचंद्र वन में भटके, मैं कैसे चढ़ूँ ऊँचा आसन।
आप खाये कंद मूल, मैं कैसे राज भोज करूँ
आप फिरें वन वन में, मैं कैसे राज सुख भोग करूँ।

लाख किया कोशिश, लेकिन श्री राम नहीं आये
हुए व्यथित तब भरत, खूब अपना अश्रु बहाये।
गले लगा कर प्रभु राम, तब भरत को समझाये
पितृ वचन का पालन करना, धर्म अपना बताये।

ठीक है भैया वचन है मेरा, सिंहासन न बैठूँगा
दे दो खडाऊं अपना मुझको, गद्दी पर रखूंगा।
मैं भी ॠषि भेष धारण कर, सरिता तट पर रहूँगा
नहीं आये यदि चौदह वर्ष में, खुद को भस्म कर दूंगा।

~ अमित मिश्र


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