बस स्टैंड

बस का सफर तो हर किसी ने किया है, लेकिन बस स्टैंड पर इसका इंतज़ार करना किसी को भी  नहीं भाता है। यह बस कईयों को उनके गंतव्य स्थानों पर आसानी से पहुचाती है, कलमकार प्रीति शर्मा की एक कविता “बस स्टैंड” पढ़ें।

कितने कस्बों,
कितनी राहों को,
अनगिनत लोगों को,
दिन-रात,
मंजिल तक पहुंचाती है।

बस स्टैंड की दुनियां,
पल-पल बढतें कदमों से,
बदल जाती है।
बसों में बैठे सपनों को,
लम्बे-लम्बे इंतजारों को।

अपनो से मिलने की,
पास पहुंचने की,
बेकरारी को,
सबके साथ,
कितने रंगों में,
भर जाती है।

सबको सबकी,
मंजिल तक,
पहुंचाती है।
कारों की भीड़ में,
दुनिया चाहे,
अपने तक ही,
रह जाती है।

पर बस स्टैंड की,
दुनिया सबको,
साथ ले कर जातीहै।
पल-पल बढतें कदमों से,
पल पल बदल जाती है।

~ प्रीति शर्मा “असीम”


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