बदली के गीत

बरसात के मौसम में बादलों का नजारा ही कुछ अलग होता है। मनमोहक रूप लेकर बादल आकाश में विचरण करते हैं और प्रकृति को शीतलता प्रपट होती है। मुकेश अमन ने बादलों पर एक गीत लिखा है – ‘बादली’।

सज-संवर कर आ रही है बादली
आज गगन में छा रही है बादली।

इतराती, बलखाती, गाती,
धरा मिलन को आ रही है बादली।
आसमां से उमड़-घुमड़ कर,
अमी रस बरसा रही है बादली।

पावस के दिन, भाते है मन,
मन लुभाने आ रही है बादली।
रिमझिम-रिमझिम, तरपर-तरपर,
बूंद-बूंद हरषा रही है बादली।

मस्त हवाओं का सफर कर,
पहाड़ों से टकरा रही है बादली।
अब मरूधरा, मजदूर, किसान,
सबके मन को भा रही है बादली।

सौंधी-सौंधी, मीठी-मीठी,
अपनी खुशबू महका रही है बादली।
तरू, पंछियों, प्रेमियों में,
प्रीत के पंख लगा रही है बादली।

सावन के झूलों पर मस्ती,
ललनाओं को झूला रही है बादली।
सावन-भादों की घटा बन,
बिजलियां गरजा रही है बादली।

फूल पर मकरन्द, तितली,
पपीहे में पीया जगा रही है बादली।
मस्त आलम, अल्हड़पन का,
अमन रस लूटा रही है बादली।

~ मुकेश बोहरा ‘अमन’


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