नज़राना (कुंडलियाँ छंद)

कैसा नजराना मिला, सकल विश्व को आज।
चलते चलते थम गये, आवश्यक सब काज।।
आवश्यक सब काज, बला ये कैसी आयी।
काली मेघ समान, घटा बनकर जो छायी।
सबके समक्ष उदास, ठाड़ा असहाय पैसा।
व्यथित मनुज समाज, मिला नजराना कैसा।।१॥

नजराने की सोचकर, दिल हो जाता बाग।
बजने लगते हर तरफ, तरह तरह के राग।।
तरह तरह के राग, पुण्य की बछिया पायी।
नहीं देखना दांत, स्वयं चलकर जो आयी।
मिला मुफ्त का माल, लगा तन मन हर्षाने।
तेरी हरदम आस, सदा मिलना नजराने।।२॥

नजराना हूँ भेजता, अपने प्रिय के पास।
अफवाहों के दरमियाँ, होना नहीं उदास।।
होना नहीं उदास, रखना सच्ची भावना।
उस पर रख विश्वास, करना डटकर कामना।
जो सुधरें हालात, तुरंत इधर आ जाना।
अपना रखना ख्याल, मिले जो ये नजराना।।३॥

~ रूपेन्द्र गौर


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