प्रकृति का दोहन

धरती माता अब करती है करुण पुकार।
मतलबी मानव ने इस पर किया अत्याचार।।

जिस माँ ने दिये हमें इतने अनमोल उपहार।
निज स्वार्थ में उसी पर हमने चलाई कटार।।

ईश्वर ने अनुपम कृति मनुज को बनाया।
इसी मनुज ने प्रकृति का चीरहरण किया।।

इशारों -इशारों में इसने हमें बहुत समझाया।
बाढ़ भूकंप महामारी का कहर अति बरपाया।।

फिर भी मानव तूं क्यों समझ ना पाया।
अब मानव जाति पर घोर संकट है आया।।

हरे भरे जंगल पेड़ पौधों को काट डाला।
गगनचुंबी सुनहरे पहाड़ भी खोद डाला।।

खनिज दोहन कर सीना मेरा छलनी किया।
इठलाती नदियों का अस्तित्व मिटा दिया।।

स्वार्थ में चूर मानव ना कर अब तूं नादानी।
बची रहने दे मेरे अस्तित्व की धोड़ी निशानी।।

~ सत्यनारायण शर्मा “सत्य”


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