हे मनुष्य

कर्म ही आपको महान बनाता है। आप बहुत कुछ अच्छा कर सकते हो बस अपने मन मस्तिष्क में ठान लेने की देर है। शिम्पी गुप्ता की यह कविता आपको कर्म के प्रति प्रेरित अवश्य करेगी।

हे मनुष्य!
हैं तूणीर में असंख्‍य बाण तेरे,
ले साध उन्‍हें, ले साध उन्‍हें।
नहीं निज वैभव सर्वदा रहता है।
मनुष्य अपने पुरुषार्थ से ही पलता है।
संघर्षों में निशि-वासर जलता है।
तब कर्म का फल मिलता है।

हे मनुष्य!
हैं तूणीर में असंख्‍य बाण तेरे,
ले साध उन्‍हें, ले साध उन्‍हें।
नहीं भाग्य का लेखा चलता है।
मनुष्‍य खुद ही भाग्‍य रचता है।
निज बाहुबल से श्रम करता है।
फिर अपना भाग्‍य बदलता है।

हे मनुष्य!
हैं तूणीर में असंख्‍य बाण तेरे,
ले साध उन्‍हें, ले साध उन्‍हें।
श्रम-बिंदु से ना तू डरता है।
मेहनत से ना तू थकता है।
प्रस्तर-मार्ग पर भी चलता है।
अपने गंतव्य को पाता है।

हे मनुष्य!
हैं तूणीर में असंख्‍य बाण तेरे,
ले साध उन्‍हें, ले साध उन्‍हें।
निशि-वासर का ना ध्यान किया करता है।
प्रतिक्षण पथ पर कदम बढ़ाए चलता है।
संघर्षों से तनिक न तू विचलित होता है।
विजय-पताका जीवन-रण में फहराता है।

हे मनुष्य!
हैं तूणीर में असंख्‍य बाण तेरे,
ले साध उन्‍हें, ले साध उन्‍हें।
कभी न तू मरने से डरता है।
मरने से पहले जीवन से लड़ता है।
अपने पुरुषार्थ से हिम्मत करता है।
पर्वत पर भी राह बनाता है।
हे मनुष्य!
हैं तूणीर में असंख्‍य बाण तेरे,
ले साध उन्‍हें, ले साध उन्‍हें।

– शिम्‍पी गुप्ता


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