फिक्र है मुझे

कलमकार दीपिका राज बंजारा ने इस कविता के माध्यम से एक फिक्र जताई है और कई सवाल पूछे हैं जिसका उत्तर हर लड़की जानना चाहेगी। हम सभी को यह समाज विश्वसनीय बनाना चाहिए जहाँ किसी को कोई आशंका व भय न हो। आज के हालात मे बेटियों के जेहन में उभरती पीड़ा को व्यक्त करती पंक्तियां –

फिक्र है मुझे कि मैं फिक्र से अंजान हूँ ।
मंजिल की ओर चल रही पर राहों से अंजान हूँ।
डरती हूँ इस जमाने की बुरी नजर से,
क्यों कि मैं हर नजर के इरादों से अंजान हूँ।
डर डर कर इस जमाने ने मुझे जीना सिखाया ।
अपना खौफ हर पल मेरे जेहन में बनाया ।
जीत लिया मैने हर ख्वाब को अपनी काबिलियत से
बस लोग क्या कहेंगॆ इसने मेरी जीत को हार से हराया ।
परिंदा बन मैने तो आसमान में उड़ना चाहा ।
पर शिकारी बन लोगों ने मेरे पंखों को काटना चाहा ।
डरती हूँ अब तो घर से बाहर निकलने में,
क्योंकि अकेला देख जमाने ने हर लड़की का फायदा उठाना चाहा ।
क्यों ये जमाना लड़की को इस्तेमाल की चीज समझता है ।
क्यों ये बेटियों को चारदीवारी में कैद रखता है ।
लड़ती है हर लड़की ख्वाबों को सच करने के लिये,
क्यों ये समाज बेटियों के लिये अपनी सोच नहीं बदलता हैं ।

~ दीपिका बंजारा


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