कुछ पाकर ही लौटा हूँ मैं

सकारात्मक सोच हमारे जीवन को ऊर्जावान बनाती है। हर पहलू में अच्छाई का विचार करें तो हार और जीत दोनों ही पसंद आएगे। हर रोज हम कुछ नया ही सीखते और पाते हैं क्योंकि खोने जैसी चीज तो बनी ही नहीं है। कलमकार अनंत ज्ञान भी अपनी रचना में बताते हैं कि मैंने खोया नहीं है बल्कि कुछ पाकर ही लौटा हूँ।

इश्क में सात समंदर पार गया,
पर जीती जंग मैं हार गया,
जो खोजने चला था मिला नहीं,
पर कोई मुझे शिकवा गिला नहीं,
मैं निराश नहीं कभी होता हूँ,
कुछ पाकर ही तो मैं लौटा हूँ,

जो सबने पाया मैनें खोया,
पर नहीं कभी इसके लिए रोया,
तब प्यासा था पर प्यास नहीं थी,
जीवित था पर साँस नहीं थी,
पर पश्चाताप के बीज नहीं बोता हूँ
कुछ पाकर ही तो मैं लौटा हूँ,

पिछली गलतियों से अनज़ान नहीं हूँ,
मैं पुराना वो अनंत ज्ञान नहीं हूँ,
हाँ खुद को सही से पहचान न पाया,
सही गलत को जान नहीं पाया,
नहीं कभी अब इसके लिए रोता हूँ,
कुछ पाकर ही तो मैं लौटा हूँ..!

खुश हूँ मैं आज खो कर सब,
पाया ही था मैं भला वह कब,
खुश हूँ की गलती फिर हुई न दुबारा,
न दोष था उनका, न दोष था हमारा,
अब कभी नहीं पछताता हूँ मैं,
और क्या पाकर लौटा हूँ, बताता हूँ मैं,

आज मेरी याद में वो जागती है, मैं सोता हूँ
बस यही पाकर तो मैं लौटा हूँ ।

~ अनंत ज्ञान

हिन्दी बोल इंडिया के फेसबुक पेज़ पर भी कलमकार की इस प्रस्तुति को पोस्ट किया गया है।
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