प्रकृति का संकट पहचानें

हिंदी कलमकारों ने प्रकृति संरक्षण की बात हमेशा कही है। हमें लगता है कि हम तो कोई नुकसान नहीं कर रहे हैं प्रकृति का, किन्तु जाने-अनजाने अनेक क्षति पहुंचा जाते हैं। कलमकार गोपेंद्र सिन्हा लिखते हैं कि अब समय आ गया है कि प्रकृति का संकट पहचाने।

समय रहते संकट को पहचानें,
आने वाली परेशानी को टालें।
जीने का एक ढंग बना लें,
मेहनत को अपना कर्म बना लें।

प्रकृति की चेतावनी समझें,
खुद को उसके ऊपर न माने।
मत करें प्रकृति से छेड़छाड़,
खड़ा होगा संकट का पहाड़।

जल-जंगल, जमीन बचा लें,
वर्ष में आप दस पेंड लगावें।
आस-पास को स्वच्छ बनाएं,
बीमारी को खुद से दूर भगाएं।

जीव जंतुओं का संरक्षण करें,
प्रकृति रक्षा का संकल्प कर लें।
करें आप जल चक्र का सम्मान,
खुशहाल होगा मजदूर किसान।

प्रकृति के प्रकोप से बचने हेतु,
खुद को प्रकृति अनुरूप ढालें।
समय रहते संकट को पहचाने,
आने वाली परेशानी को टालें।

~ गोपेंद्र कुमार गौतम


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