जैसलमेर की सैर

बच्चे जैसलमेर शहर की सैर करना चाहते थे और शहर की नयी-पुरानी जगहों पर उन्हे पहुंचना है। बालकवि मुकेश अमन ने इस दृश्य को बखूबी अपनी कविता में चित्रित किया है। अब आप जैसलमेर को जानने के लिए यह कविता पढ़ें।

रिक्शे वाले, रिक्शे वाले ।
ठहरो हम भी चलने वाले।।
हम बच्चों को करनी सैर।
शहर घुमा दो जैसलमेर।।

अब ना भाई देर करो तुम।
अब रिक्शे को गियर धरो तुम।।
हमें करा दो सैर-सपाटा।
भीड़-भाड़ और खास-सन्नाटा।।

स्वर्ण दुर्ग, रेतीले धोरे।
जहाँ आते परदेशी गोरे।।
दिखलाओ इतिहास निशानी।
सागर मल गोपा सेनानी।।

पटवों, सालमसिंह की हवेली।
बीते कल की छुपी पहेली।।
लोक-गीत, संगीत सुनहरा।
दिखला दो, सुनवां दो सारा।।

जैसल की धरती है प्यारी।
सैर करा दो आज हमारी।।

~ मुकेश बोहरा अमन

हिन्दी बोल इंडिया के फेसबुक पेज़ पर भी कलमकार की इस प्रस्तुति को पोस्ट किया गया है।
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