आ अब लौट चलें

कलमकार कुलदीप दहिया की एक कविता पढिए जिसमें उन्होने इंसानी फितरत और मौजूदा हालातों को चित्रित किया है।

हैं चारों ओर वीरानियाँ
खामोशियाँ, तन्हाईयाँ,
परेशानियाँ, रुसवाईयाँ
सब ओर ग़ुबार है!
आ अब लौट चलें

चीत्कार, हाहाकार है
मृत्यु का तांडव यहाँ,
है आदमी के भेष में
यहां भेड़िये हजार हैं!
आ अब लौट चलें

खून से सनी यहाँ
इंसानियत की ढाल है,
नफ़रतों के ज़हर से
भरी आँधियाँ बयार हैं!
आ अब लौट चलें

ज़मीर मिट चला यहाँ
क़ायनात शर्मसार है,
घोर अंधकार में यहां
गुमनामियाँ सवार हैं!
आ अब लौट चलें

कस्तियां यहाँ डूब रही
लहरों में उभार है
है डूबता वही यहाँ
गुमाँ का जिसमें ख़ुमार है!
आ अब लौट चलें

मुफ़लिसी के दौर में
मजबूरियां बेशुमार हैं,
नज़र जहां भी पड़े
अंगार ही अंगार हैं!
आ अब लौट चलें

मंज़र ये कैसा यहाँ
फ़िक्र में जहान है
ना सरहदें महफ़ूज यहाँ
सब दिलों में ख़ार हैं!
आ अब लौट चलें

स्वार्थ को बेड़ियों से बंधे
सब गुमनामियों की कैद में,
सब्र है किसे यहाँ पे
तंग सोच से बीमार हैं!
आ अब लौट चलें
विश्वास के पनपते बूटों पे
दगाबाज़ इल्लियाँ सवार हैं,
कब तलक जलेगा “दीप” यूँ
दामन सभी दाग़दार हैं!
आ अब लौट चलें

~ कुलदीप दहिया “मरजाणा दीप”


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