जिंदगी लॉकडाउन

इस सुनसान सड़क में
एक कोना हैं
चादर से लिपटा हैं
कुछ घर सा दिखता हैं
इस लॉकडाउन में भी
पूरा खुला हैं
बिना दिवार का वो
महल सा लगता हैं
कुछ आवाज़े आती हैं
कुछ सिसकियाँ
उस कोने में हैं
कई जिंदगिया

एक मासूम
दौड़ा दौड़ा फिरता है
इतना बेख़ौफ़ उसे
पहली बार देखा है
इस सूनी सड़क पर
अब खेल सकेगा बिना रूककर
अब उसे कोई वाहन
नहीं मारेगा टक्कर

एक सवाल है अब तक
भूख लगेगी तो कहाँ से खायेगा
पेट भरकर?

इतने में उसकी माँ आई
यूँ डांट उसे ले गयी
बाहर बीमारी फैली तू
सुधरता क्यों नहीं?
मासूमियत ने उत्तर दिया
गाड़ी का इन्तजार था माँ
जो खाना लाती है

इतने में माँ गले से लगाती है
छाती से दूध पिलाती है
उसकी भूख मिटाती है
मगर उस माँ की भूख का क्या?
क्या वो भूखी ही सो जाएगी
या कोई सरकारी गाडी
उसे खाना पहुचायेगी!

~ सचना शाह


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