जीवन दर्शन- कवित्त

भक्तिकाल को हिंदी साहित्य का स्वर्णिम युग माना गया है। संतों और कवियों ने काव्य को अनेक विधाओं में प्रस्तुत कर मनमोहक रचनाओं का संग्रह हमें विरासत में दिया। आज हम आधुनिक हिंदी में काव्य रचनाएं अधिक करते हैं, लेकिन उपभाषाओं के काव्य छंदों की लोकप्रियता का जवाब नहीं है। कलमकार आत्माराम रेवाड़ ने एक कवित्त छंद लिखा है, आप भी पढें।

त्रिलोकी भरण वारो, काम जाको बांको न्यारो,
भूखो बैठो केळा खावै, छिलका समेत है।
तिथि सेस मुख जिति, माला के माणक जिति,
रानियां बिसार हरि, कुब्जा सुख लेत है।।
देवन सहारो होत, दैत्यन को मारो बोत,
गीता से जगाई जोत, व्याध ते चेत है।
गोपी पट हरि हरि, द्रोपदी की लाज राखी,
चीर को हरन वारो, चीर कैसे देते हैं।।

~ आत्माराम रेवाड़

हिन्दी बोल इंडिया के फेसबुक पेज़ पर भी कलमकार की इस प्रस्तुति को पोस्ट किया गया है।
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