पत्थर की अभिलाषा

हमारी तो अनेक इच्छाएं होती है, किंतु क्या आपने कभी सोचा है कि पत्थर की भी अभिलाषा हो सकती है? नहीं ना! ऐसा केवल कवि ही सोचते हैं और अपनी कविता में सभी लोगों से बताते हैं। आइए कलमकार अजय प्रसाद जी कविता के जरिए एक पत्थर की इच्छा जानते हैं।

चाह नहीं कि मै कोई स्मारक बनूं
न किसी के चोट का कारक बनूं।
न किसी राहगीर के पैरों का ठोकर
न किसी मंदिर की मूर्ति का धारक बनूं।
न तो किसी मस्जिद की ऊँची मीनार
न बनूं किसी चर्च की कीमती दीवार।
न महापुरुष की प्रतिमा का आकार
न बनूं अमीर के घर का चौखट द्वार।
हे प्रभु! मेरी बस यही है प्रार्थना
बनूं मजलूमों के हाथों का औजार
बच्चों के फल तोडने का हथियार
जिस से पेट पाल लेता हो कुम्हार
या शहीदों के समाधि का आधार।

~ अजय प्रसाद

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