कन्हैया लाल गुप्त जी प्रीत/प्रेम के बारे में अपनी इस कविता में लिखते हैं। कई उदाहरणों द्वारा अपने विचारों को प्रकट करने का उत्तम प्रयास किया है।
प्रीत ऐसे ही किसी से नहीं होती।
राधा ऐसे ही किशन पर नहीं मरती।
मीरा क्या बगैर प्रीत के दिवानी हुई।
जो विष प्याला अमृत जान पी ली।
शिवा बिना प्रीत के शिव पर मरी।
जो जन्म जन्मान्तर की कथा बनी।
सोहनी को भी महीवाल से प्रीत थी।
तभी तो सोहनी कच्चे घड़े से तैर गई।
हीर भी राँझे पर जाँ छिड़कती थी।
शीरी भी फरियाद से प्रीत करती थी।
रोमियो भी जूलियट पर मरता था।
कई जूनूनी लोग राष्ट्र से प्रीत करते है।
विद्यार्थी भी विद्याज्ञान से प्रीत करते है।
अन्नदाता अपनी मिट्टी से प्रीत करते है।
तभी तो जी जान खेतों में लगा देते है।
गगन को भी तपती धरती से प्रीत है।
तभी अश्रु बहा उसे शीतल करता है।~ डॉ. कन्हैया लाल गुप्त ‘शिक्षक’
Post Code: #SwaRachit383
Leave a Reply