सार्थक मृत्यु

हर चीज़ के अस्तित्व की एक समय सीमा होती है। हमारी कविताओं का क्या होगा? हमारे बाद क्या वे अपना असर दिखा पाएँगी? रचयिताओं की कल्पना का आप अनुमान नहीं लगा सकते, कलमकार तान्या सिंह जी लिखती हैं कि हमारी मृत्यु सार्थक तब ही मानी जा सकती है जब इन कविताओं को लोग पढ़ा करें।

अँधेरे में चुप्पी के प्रसव पीड़ा से
मैंने जना है- ‘कुछ अछूत कविताओं को’
इनका जन्म सामान्य था
लेकिन अनुभव सुखद नहीं था।
रोने पर अपमान, खुश होने के ताने से
मिली ख़ामोशी का कोई अनुवाद न हो सका।
जैसे शब्द बने ही नहीं थे,
उनके लिए तो मन के अलावा,
कोई ठिकाना नहीं था।
जीवन जितना कठिन होता गया,
पंक्तियां उतनी छोटी और सरल हुईं।
लेकिन मैंने उन्हें दूध नहीं पिलाया
सपनों के साथ दूध भी सूख गया।
इनकी जड़ें मेरी ज़िन्दगी से जुड़ी थी;
जिन्हें मेरे जीवनकाल तक, मृत ही समझा गया।
कलम की यात्रा पांव की बेड़ियों से लेकर
पल्लू में बँधी ख़ामोशी तक,
एक कोने में पड़ी रही।
फिर कुछ लिखा नहीं मैंने, जो तुम्हें याद रहे।

हर इंसान के पास होता है
वजूद अपनी कविताओं का
लेकिन उसकी उम्र तो
समाज, मजहब या समय की सियासत ही जी पाती है।
उसी तरह कुछ कविताएँ अधूरी मिलेंगी
संभावनाओं से परिपूर्ण, समझ से परे।
जो मेरे साथ,जल जायेंगी।
कन्धा देने के लिए तुम्हें, जो बच जाएँगी
उन्हें पढ़ना वर्तनी और उच्चारण के साथ
कोई सुन लेगा तो कविताएँ जी उठेंगी,
वो अपनी नम आँखों से, जब तुम्हें देख रही होंगी,
तब मेरी मृत्यु सार्थक हो जायेगी।

~तान्या सिंह

हिन्दी बोल इंडिया के फेसबुक पेज़ पर भी कलमकार की इस प्रस्तुति को पोस्ट किया गया है।
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