परम्पराओं की संवाहक माँ

रीति-रिवाजों और परम्पराओं की संवाहक माँ,
घर एक संस्था तो इस संस्था की संचालक माँ।
ऊंच-नीच, भेदभाव रहित, सबको ही मिले और बराबर,
आशा और विश्वास की केंद्र, ऐसी एक अभिभावक माँ।

माँ का साथ तो रीति-रिवाज़ और परम्पराएं हैं,
गर साथ नही तो सब भूली-बिसरी यादें हैं।
धर्म-कर्म और रिवाजों को पीढ़ियों तक संचारित करती,
परम्पराओं को जिन्दा रखने की यही एकमात्र संरक्षक माँ।

अलगाव हो, मनभेद हो या हो चाहे शिकायतें हजार,
बचपन, जवानी या चाहे गृहस्थी से होना पड़े दो-चार।
तीज-त्योहारों के रिवाजों से सबको पास है लाती,
परंपरा से परिवार जोड़े रखने की यही समर्थ संयोजक माँ।

मेरी माँ, तुम्हारी माँ, आज की माँ और कल की माँ,
बदलेगा बहुत कुछ पर चलता रहेगा एहसास का कारवां।
रिवाजों से बनती परंपरा.., परम्पराओं में बसतें रिवाजें,
परंपरा तोड़ी किसने? नई बनायी क्यूँ? पर इसकी असली उद्धारक माँ।

~ विनय कुमार वैश्यकियार


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