आँचल बीच समा लेती हो

माता की ममता और प्रेम हमारे सारे दुख हर लेती है। केवल माँ ही है जो अनेक तकलीफों में रहने के बाद भी अपने बच्चों का भला चाहती है। कलमकार रीना गोयल की यह कविता माँ के असीम प्यार और स्नेह की छत्रछाया का वर्णन करती है।

दुग्ध पिलाकर अपने उर का, आँचल बीच समा लेती हो।
अपने हाथों से सहलाकर, मन की थकन मिटा देती हो।

बोध कराती ऊंच नीच का, कर ममत्व की छाँव निराली।
प्रथम शिक्षिका मात तुम्ही हो, संस्कार सिखलाने वाली।
अपने सुत के हित हितार्थ माँ, तुम सर्वस्व लुटा देती हो।
अपने हाथों से सहलाकर, मन की थकन मिटा देती हो।

मानव हो या पशु-पक्षी भी, जननी तो जननी होती है।
स्वार्थ, कपट छल दम्भ से परे, निश्छल माँ ममता होती है।
पशु, जीव नर और नारायण, माता क्षुधा मिटा देती हो।
अपने हाथों से सहलाकर, मन की थकन मिटा देती हो।

ऋणी हुआ मैं माता ऋण से, श्वाश श्वाश है कर्ज तुम्हारा।
नहीं जुबां से कुछ कह पाऊं, मैं बालक नादान तुम्हारा।
विकल देख माँ अपने सुत को, निज के दु:ख भुला देती हो।
अपने हाथों से सहलाकर, मन की थकन मिटा देती हो।

~ रीना गोयल
विधा-सुगत सवैया

हिन्दी बोल इंडिया के फेसबुक पेज़ पर भी कलमकार की इस प्रस्तुति को पोस्ट किया गया है।
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