अंतिम सफर- मेरी यात्रा

हमारा जीवन अनेक संघर्षों और कसौटियों से भरा होता है। सभी को उनसे पार पाते हुए आगे बढ़कर अपना सफर तय करना ही पड़ता है। कलमकार खेम चन्द जी ने इसी सफर को काव्यात्मक ढंग से प्रस्तूत किया है।

टूट गई टहनियाँ छूट गये शाख से पत्ते,
धीरे धीरे ढह गया परिपक्व था जो गहरा पेड़ का तना।

हर फिजाओं, हर घटाओं घोर विकट परिस्थितियों पर मन रहता है मेरा फना।
कैसा छा रहा है मेरे शहर में ये कोहरा घना,
जेब खाली है हमारी भूख हौंसलों को जकड रही है मंहगा है खेत का चना।

बारिश में सर छुपाया धूप से बचाये छांव,
शहर नहीं पसंद है मुझे हिमालय के जंगलों में बसे मनोरम गांव।

सफर लम्बा है मेरे संघर्षों का कई लडाई बाकि है,
क्योंकि अभी उम्र के इस पडाव में थके नहीं है मेरे पांव।

सो रहा कैसे मौत के सौपान पे, ग्राम के पुराने मकान में।
थम रही है सांसें रूक रहा काफिला वो बातों का,
उजाला कितना शब्दों का उत्साहित कर रह अंधकारमय रातों को।

सागर की लहरों में पानी भरूं, दो पल की विपत्ति से मैं क्यों?
डरूं, जी लिया बहोत संघर्षों का जीवन अब मौत से कैसे डरूं।

फिर जीवन मिला तो काम फिर उत्थान का करूं,
फिर हर वर्ग, हर तबके को सही मालाओं में पिरोऊं।
तब तक जागाये रखना विचारों मुझे, काम पूर्ण करने के बाद मैं गहरी निद्रा में सोऊं।

~ खेम चन्द

हिन्दी बोल इंडिया के फेसबुक पेज़ पर भी कलमकार की इस प्रस्तुति को पोस्ट किया गया है। https://www.facebook.com/hindibolindia/posts/390533991853779

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