प्रकृति और मनुष्य

प्रकृति और मनुष्य का रिश्ता बहुत ही प्यारा है, इसे और मजबूत करने की आवश्यकता है। कलमकार सुमित सिंह तोमर बताते हैं कि किस प्रकार प्रकृति को क्षति पहुंच रही है, अनेक प्राणी तो विलुप्त होने के कगार पर हैं। हम सब को मिलकर इसका संरक्षक बनना है।

हर ओर व्याधि की व्याकुलता
हैं त्रस्त मनुज हर ओर यहाँ।
हाहाकार मचा ऐसे मानो रण में है अस्थिरता।
हे मनुष्य! खोलो निद्रा, हो जाए कही न नश्वरता
जब जब मानव होकर मद में प्रकृति को झुठलाएगा
तब नाश मनुज का छाएगा, तब नाश मनुज का छाएगा

कोयल की कूक नही अब तो, न ही रही वो राम चिरैया
घर के आंगन में खेला करती, वो सुंदर प्यारी गोरैया
आँखों से ओझल हुए दृश्य, मानो जैसे क्षण भंगुरता
निज स्वार्थ पेड़ वो काट दिए, जिनसे थी उनकी निर्भरता
हो कर अहं में जब जब तू, खगकुल को तड़पाएगा
तब नाश मनुज का छाएगा, तब नाश मनुज का छाएगा

नदिया का जल भी दूषित है, पावन न रही वो गंगा अब
कल कल बहती थी जो यमुना, हो गई प्रदूषित जाने कब
सूख गईं अब नदियां, परवर्तित हो गई नालों में
ऐसा लगता है जैसे हम, चले काल के गालों में
जब जब इन अमृत मयी नदियों का, तू अस्तित्व मिटाएगा
तब नाश मनुज का छाएगा, तब नाश मनुज का छाएगा

बढ़ चले पथिक जो अग्र ओर, क्या छोड़ चले वो सुखद भोर
निश्चित ही विकाश मिला हमको, क्या मिल पाया वो रसभिभोर
आओ मिलकर ये प्रण ले हम, प्रकृति को अब न दुःख दे हम
पेड़, पक्षी ओर नदियों का सम्मान बचाए सुख दें हम
मन झूम उठेगा गाएगा प्रकृति का
कण कण मुस्काएगा
न नाश मनुज का छाएगा, मानव  ‘मानव’ कहलाएगा।

~ सुमित सिंह ‘सात्विक’


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