दर्द-ए-रूह

अंतर्मन से मिलने वाले सुझाव और सवालों के जवाब सदैव उत्तम ही होते हैं। रूह/आत्मा को जब ठेस पहुंचती है तब शांति प्रदान करने वाली सलाह मन ही देता है। कलमकार खेम चन्द ने इस कविता में रूह के दर्द को रेखांकित किया है।

मेरे दर्द का भी मेरी जिन्दगी में आना एक बहाना है
इस दर्द का भी हर डाली पर बना अपना ठिकाना है।
ये जो राख ढूंढा करते हो शमशानों की
उस राख का भी कोई जमाना है॥

कौन छोटा कौन बड़ा इंसानियत का एक जैसा पैमाना है
ये जो कोने में बैठे हैं आज़ वक्त कभी इनका भी दीवाना है।
माना मेरे जीने का तरीका ज़रा थोड़ा पुराना है
मेरी सांसों को पूछो तो सही कब तक का याराना है॥

कब कौन मिलेगा सफ़र में मुझे
और किससे मुझे दिल लगाना है।
ये रूह है किराये की
किसको अब हिसाब मुझे बताना है॥

पढ़े नहीं है जो कागज़ मैनें उस पुरानी डायरी के
कल ही देखे थे और आज़ उन्हें जलाना है।
जो लिखा ही गया था पढ़ने के लिये कलम
उस दर्द को अब कैसे हटाना है।
ये जीवन है चंद लम्हों का
शायद ऐसे ही इसे बिताना है॥

~ खेम चन्द

हिन्दी बोल इंडिया के फेसबुक पेज़ पर भी कलमकार की इस प्रस्तुति को पोस्ट किया गया है।
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