दर्द आंसुओं का

हम अपनी व्यथा को बयान कर सकते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आंसुओं को भी कष्ट हो सकता है? कवि ऐसा सोच सकते हैं और उनसे बात भी कर सकते हैं। कलमकार खेम चन्द ने आँसुओं का दर्द जानने की कोशिश की और अपनी कविता में बखूबी दर्शाया है।

कितनी होती है पीड़ा हमें ये कोई जान नहीं सकता
चेहरे से छलकता है गमों का जाम ऐसा
हमें कोई नाम दे नहीं सकता।
कभी खुशी में छलके तो कभी किसी के गम में टपक पड़े
बून्द में छिपी व्यथा को कोई प्रेमी न गढ़े।
तुम क्या जानो साहिब, तुम तो बने फिरते हो नवाब
नदी से लेकर सागर को पुछो हम बना सकते हैं तलाब।
तलाब बनाने का मतलब सिर्फ़ पानी नहीं
हम आंसुओं की भी छोटी सी कहानी नहीं।
पानी में वो चेहरा पहचान न पाए,
बेदर्दी होकर मेरे जनाज़े में मुस्कुराए
आखिर अपने ही बनाते हैं हमें पराए।
किस हद तक है प्रेम मुझे तुझसे
आखिर तेरे अपने नयन ही करते जुदा तुझे मुझसे।
एक बार हमारे लिए कुछ करके तो देख
दुनिया को तेरा न बना डालूं तो मिटा देना मेरा ये दर्द का लेख।
जमाना न जाने मैं किसका दीवाना
बुझेगी नहीं शम्मा कभी मैं हूँ वो परवाना।
दूसरों के गमों को जताते हम
हमारे बिछड़ने पर नहीं होती किसी की आंखें बन्द।
क्यूंकि सभी बने फिरते हैं यहाँ स्पन्द।
किस हद तक लिखुं मैं अपनी व्यथा
बहुत लम्बी है हम आंसुओ की छोटी कथा।
महफ़िल में निकलूं तो कहते हैं इसे तो है धोखा मिला
मेरा कोई नहीं इसका मुझे क्या गिला।
किसी भी मोह का नहीं है मुझमें कवच
कौन क्या जाने मैं हूँ कितना स्वच्छ?
कभी फुरसत मिले तो मुझे याद करना
यूंही न मुझे दिखावे के लिये आज़ाद करना।
किस-किस रूप में हूं मैं समाया
आखिरी छोड़नी पडती है मुझे काया।
लोगों के लिये बन जाता हूँ मैं पराया।
फलक तक देखा तो चांद तारों को पाने चले हैं हम
आखिर उस रास्ते पर भी खुदा ने बिछा रखे थे गम।
इतनी छोटी भी नहीं है मेरी कहानी
कि मुझसे बिछड़ने के बाद याद न आए किसी को कमबख्त जवानी।

~ खेम चन्द

हिन्दी बोल इंडिया के फेसबुक पेज़ पर भी कलमकार की इस प्रस्तुति को पोस्ट किया गया है।
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