पथिक तुम सुनो

ख्वाब में आते हो,चले भी जाते हो
गरीबी सहते हो, गरीबी खाते हो

ऐ निकलने वालों पथिक तुम सुनो
बहुत रोने वालो श्रमिक तुम सुनो

तेरे पेट में जो, इक दाना नहीं
कैसे भूख मिटे, कोई खाना नहीं
तेरा प्यास बुझे, कतरा पानी नहीं

तू वापस आए क्यों?
नींद में सोए क्यों?
ट्रेन से कटकर यूं!
मौत बुलाए क्यों?

तू अपने गावों में
बाग़ की छावो में
पिता के पावो में
मां के आंचल संग जो दरिया है

क्या सच में आओगे
क्या सच में जाओगे
कि तू घर को जाओगे
कि तुम बिन रोज़ी सारी दुनिया है
ख्वाब में आते………..

तेरे कांधे पर, सारा देश टिका
तेरे तन पे नंगा, वेश टिका

तेरा हड़ मांस का, जो बदन
तेरी शवांस नली व तेरा मन
तेरी काया को, मेरा नमन

तू दुखियारा ही क्यों?
तू जग हारा ही क्यों?
भर्राए गर्दन की!
रुवांसा नारा क्यों?

तेरी हर मेहनत की
तेरी हर हिम्मत की
सपन सी जन्नत की
महकेगी एक दिन जी बगिया है

क्या सच में आओगे
क्या सच में जाओगे
अकेले रोओगे
कि तुम बिन रोज़ी सारी दुनिया है
ख़्वाब में आते

मीठी रोटी, तेरे नसीब नहीं
सुखी रोटी भी, तेरे करीब नहीं

तेरा चूल्हा जला और बुझ भी गया
तेरी शाम ढली सूरज रुक भी गया
आंधी रात में ही अंबर झुक भी गया

तू बेचारा ही क्यों ?
तू लचारा ही क्यों?
तू अंबर के ही तले
बस किनारा ही क्यों?

तेरे उस सोहबत का
तेरे उस मकसद का
धरा के बरकत का
सावन बिन सारी कुटिया है

क्या सच में आओगे
क्या सच में जाओगे
क्या जग को चीरोगे
की तुम बिन रोज़ी दुनिया है
ख़्वाब में आते

~ इमरान सम्भलशाही


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