लाल हरी चूड़ियां

यहां की प्रत्येक महिला को साहब,
बहुत भाती हैं ये लाल हरी चूड़ियां !
श्रृंगार का प्रमुख भाग बनता इनसे,
चाहे युवती हो या हो चाहे बुढ़िया !

क्या मालूम है ये कड़वा सच इन्हें,
हमें काम कितना करना पड़ता है?
कांच के टुकड़े जुटाने में हमें यहां,
धूप में भूखा ही सड़ना पड़ता है!

कांच मिलते ही हमें मालिक द्वारा,
काली कोठरियों में फेंका जाता है!
जहां अधिकांश अंधेरा फैला रहता,
बस भट्टी का गर्म झोंका आता है!

अन्दर की घुटन में काम करते हुए,
न जाने कब ये उम्र निकल जाती है!
बाहर आते ही छा जाता बस अंधेरा,
आंखें बमुश्किल कुछ देख पाती हैं!

“किंतु दूसरी तरफ तैयार मिलती हैं,
चूड़ियों की कई रंग बिरंगी लडियां !
यहां की प्रत्येक महिला को साहब,
बहुत भाती हैं ये लाल हरी चूड़ियां !”

ये काला कारोबार है चलता वहां,
जहां इस देश की तंग गलियां हैं!
हर दिन मुरझाता एक फूल यहां,
नुचती उसकी समस्त कलियां हैं!

यूं नित पिस जाने पर भी देखो,
होता हमारा तनिक सम्मान नहीं!
हम भी इंसा हैं ऐ मिल मालिक,
कोई शक्ति स्वरूप भगवान नहीं!

विरोध कभी जो किया हमने तो,
हमें जेलों तक घसीटा जाता है!
भूखा व प्यासा रख हफ़्तों तक,
घोर निर्ममता से पीटा जाता है!

मजूरी करते हैं हम सब इनकी,
पहन पैरों में मोटी मोटी बेड़ियां !
यहां की प्रत्येक महिला को साहब,
बहुत भाती हैं ये लाल हरी चूड़ियां !

न कोई प्रबल नायक है अपना,
न ही है कोई सामर्थ्यवान नेता!
हमारा गुलामी का ये पेशा हमें,
थू थू कर अब तो लानत है देता!

अब तो शायद दिन व रात हमें,
बस यही सोचकर जीना होगा!
जीवन कर्कश कंटीली शैय्या है,
इसका ये विष हमें पीना होगा!

न जाने किस रोज़ मिटेंगी यहां,
ये ज़ात और धर्म में खिंची दूरियां !
यहां की प्रत्येक महिला को साहब,
बहुत भाती हैं ये लाल हरी चूड़ियां !

ज़रा बरसने तो दो विद्या का जल,
खिलते तो दो यहां नन्हे नन्हे फूल!
मूर्छित न होने पाए एक भी इनमें,
हटा दो इनकी राहों से सभी शूल!

इस संघर्ष में थम लो इनका हाथ,
रह न जाए कहीं ये जंग अधूरी!
बन्द करवा दो सभी मौत के सौदे,
अब न हो कभी बाल मज़दूरी!

फिर शीश उठाए जो ये शोषण कभी,
तो आरोपियों पर लगी हों हथकड़ियां !
यहां की प्रत्येक महिला को साहब,
बहुत भाती हैं ये लाल हरी चूड़ियां !

~ इं० हिमांशु बडोनी (शानू)


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