दौर-ए-सोशल मीडिया

आजकल सचमुच रिश्तों में दूरियां बढ़ रही हैं। खेम चन्द अपनी कविता के माध्यम से सोशल मीडिया का रिश्तों पर बढ़ते प्रभावों को रेखांकित करने का प्रयास किया है।

गुजर गया ना जाने कब
वो एक चिठ्ठी-पत्रों का जमाना
हर घर हर हाथ को बना लिया है
आज दूरभाष यन्त्रों ने अपना ठिकाना।
मिल जाता है मन बहलाने का
यहाँ सबको बहाना
मैं ही सोनम बेवफा हूँ फेसबुक, इंस्टाग्राम पे
तुम मम्मी -पापा को मत बताना।
खैरियत पुछता यहाँ आज कौन है
बस गुजर जाये दिन हाथ में सबके फोन है।
बहुत हो रही रोज यहाँ फो़र जी डेटा की खपत
नहीं रही हाल चाल पुछ सके बुजुर्गों के समय की बचत।
हर घर हर गली हर चौराहे पर सभी सिर झुकाये हैं
बेमतलब के रिश्ते हम सबने
आज सोशल मिडिया में बनाये हैं।

 

लाईक, काॅमेंट, शेयर से
हो रहे हैं हम सभी मालामाल
घर में बुजुर्ग कोने में बैठे हैं बेहाल।
एक दूसरे से ज्यादा लाईक, काॅमेंट, शेयर
मिलने की कैसी ये होड़?
मेरे भाई! इस मोहमाया को आज ही छोड़।
थोड़ा रिश्ता घर, नाते रिश्तेदारी से भी जोड़
यूं ना मुख सोशल मिडिया के लिये अपनों से मोड़।

 

घर से लेकर विद्यालय और
हर एक आॅफिसों का हाल यही संभाले है
उंगलियों पर जुबान लगी है
मुंह में आज हम सबके ताले हैं।
टेलिग्राम, व्हट्सएप्प और
ना जानें कितनी यहाँ पली आशाएँ हैं
मंजर टिक टाॅक पर शरारतों का
टिकी हम सबकी निगाहें हैं।
पब जी से लेकर फ्री फायर में
हर एक उम्र का वर्ग मस्त है
ना मालूम कब सुर्योदय
और कब चन्द्रमा अस्त है।

 

थोड़ा सा फोटो को फोटोशॉप कराकर अपलोड करेंगे
हमारा अस्तित्व क्या और हम कब इस बिमारी से लड़ेंगे।
बेतुकी बातों का यहाँ हम सबने बुना मायाजाल है
बच्चों को तो छोड़ दो
आज बुजुर्गों का भी सोशल मिडिया लाजवाब है।
बेच डाली हमने शर्म, बेच डाले रिश्ते पुराने हैं
ढूँढने पर भी नहीं मिल रहे मुझे
वो जो गुजरे संग जमाने हैं।
हर जुबां पर गुनगुनाते सभी यही तराने हैं
सोशल मिडिया पर देख मेरे कितने दीवाने हैं।

 

बदल जायेगा कभी ये भी एक जमाना
जब मिलेगा नहीं परिवार को ही परिवार का ठिकाना।
थोड़ी बातें घर परिवार से भी कर लिया करो
नादान कलम बहुत मुश्किल हो जायेगा आदत छुड़ाना।

 

~ खेम चन्द

हिन्दी बोल इंडिया के फेसबुक पेज़ पर भी कलमकार की इस प्रस्तुति को पोस्ट किया गया है। https://www.facebook.com/hindibolindia/posts/378656313041547

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