भारत माँ के सपूत

हंदवाड़ा  शहीदी को नमन करती एक कविता।

कौन कहता है बेटे विदा नहीं होते है
जब तिरंगे में लिपटा उनका देह आया होगा।
उन सपूत की माँ का दर्द भला कौन समझ पाया होगा।

कोई मोल नहीं लगा सकता उनके प्रेम के क्षमता
का, फिर क्यो भूल जाते है सब उनकी ममता का।

वो देश का सिपाही, माँ का सपूत देशभक्ति का जुनून
कैसे लौट जाता हिंदवारा छोड़ कर।

मरना तो सबको है, सरहद पर मरते दम तक उनमे
जिंदा ईमान रहा, होंठो पे कलाम दिल में हिंदुस्तान रहा।

शस्य श्यामला इस धरती के जैसा जग में कहीं और
नहीं, भारत माता की गोद से प्यारा कोई ठौर नहीं।

इस हालत में जो घर से निकलना एक चुनौती है
फिर वो कैसे भेजी तिलक लगा के, पत्थर सीने पे।

ये है वतन के रखवाले! बारम्बार भारत माँ के आँचल
के लिये रंग जाता है, कौन कहता है बेटा विदा नहीं होता।

खुशनसीब है वो माँ, जो वतन के लिए ऐसे पुत्र दे
जाते है, मर के भी वो लोग अमर शहीद हो जाते हैं।

सलाम है तुझको ऐ अमर शहीदों कर्ज़दार है हम सब
वतन वाले, भारत रत्न भारत माता के सच्चे सपूतो को शत् शत् नमन।

~ पुजा कुमारी साह


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