छात्र मनोव्यथा

छात्र जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना कर हमें अध्ययन करना पड़ता है। यहीं अनुशासन सीखा जाता है जो जीवन भर आप के साथ रहता है। चित्रकूट से शुभम ने अपना अनुभव इन पंक्तियों के सहारे साझा किया है।

मेरी पढाई ही मेरी ऊंचाई है,
पास मेरे सजी मेरी चारपाई है,
निंदिया रानी भी सताने को आई है,
बार-बार आई मुझे जुन्हाई है।

शीत लहर रात्रि प्रहर पहला,
जबरन मैं ओढ़ रजाईपढ़ने को बैठा,
आँख मेरी बंद हो-हो खुलती,
सोती जगती मन को आहत करती।

सब देख रहे रहे थे घर में,
वरना मैं सो जाता,
घर में शायद सब सो गए,
मैं जागते देख निराश हो जाता।

मन झकझोर कर कहता पढ ले,
सुनहरा पल पल है तेरा पढ़ने का,
दगा न दे खुद को वरना फिर,
भविष्य में करूण कथा गायेगा।

कर निश्चय नित मैं निद्रा में जाता,
प्रातः उठने में मन मेरा कतराता,
ओढ़ रजाई फिर टांग तान कर सोता।

मैं नित सोचा करता हूँ,
ये व्यथा है सिर्फ मेरी,
या मेरे यारों जी भी,
मगर कुछ समझ न आता है।

~ शुभम द्विवेदी

हिन्दी बोल इंडिया के फेसबुक पेज़ पर भी कलमकार की इस प्रस्तुति को पोस्ट किया गया है।  https://www.facebook.com/hindibolindia/posts/409200799987098
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