रातें तुम्हारी बातें

खेम चन्द ने अपने कुछ खयालात इस कविता में जाहिर किए हैं। रातों से बात करने का मंजर पेश किया है, आप भी पढें उनकी लिखी गई कविता – ‘रातें तुम्हारी बातें’।

गुजरती नहीं है ये रातें
मैं तो यूं ही गुज़ार देता हूँ।
खुद को ही स्वप्नों के आगोश में
बस यूं ही पुकार लेता हूँ॥
क्या कहूँ जिन्दगी तेरे बारे में
स्वप्न भी तो मैं तुझसे उधार लेता हूँ।
आईना नहीं है पास मेरे
फिर भी स्वप्नों को संवार देता हूँ॥

कभी ये तो कभी वो
करवटें उतर जाती है।
सुबह होने पर ये जिन्दगी भी
क्यों मुझसे मूकर जाती है॥
तारें गिनूं या
चन्द्रमा को उपहार कोई वार दूं।
बन्द कमरे की चारदीवारियों में
खुदी को उत्तम संस्कार दूं॥

अंधेरा है घनेरा
आँखों को रोशनी हथियार दूं।
खुद की जिंदादिली को
कोई ललकार दूं॥
यें रातें है ग़ज़ब की तन्हा जमाने से
“नादान कलम” इनको साथ अपना प्यार दूं।
कैसी है अबूझ ये चांदनी रातों की सरगर्मी
तुम कहो तो रोशन चंदा को नकार दूं॥

नींद नहीं इन आंखों में
और महीनों से सोई भी नहीं
इनको पल दो पल की झपकी उधार दूं।
कहे हमें जगाना मत अब निद्रा से
कोई स्वप्न फिर इनको निखार दूं॥
आ रात आज फिर जी भरकर
तुझे बातों का कारवां सौंप दूं।
खुद को तेरे अंधेरे तले
अंधकार में झौंक दूं॥
सो रहा हूँ अब में रात
स्वप्नों को मंजिल फिर नई सौंप कर।
फिर लौटूंगा तुझसे बातें करने
तू बिछोडे से ना डर॥

~ खेम चंद

हिन्दी बोल इंडिया के फेसबुक पेज़ पर भी कलमकार की इस प्रस्तुति को पोस्ट किया गया है। https://www.facebook.com/hindibolindia/posts/382838425956669

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