वो काली रात

गुनाहगार न होते हुए भी कभी-कभी हमपर लोगों द्वारा आरोप लगा दिए जाते हैं। ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति की मनोदशा क्या होती है – यह कलमकार खेम चन्द जी अपनी कविता ‘वो काली रात- झुठ’ में बखूबी लिखते हैं।


कर के नशा होश हमने गवांए थे,
वो भी बिन देखे किसी ने
हम पर इलज़ाम संगीन लगाए थे।
वाह रे समय की कारीस्तानी
तुमने हमारे होशोहवाश चुराकर
हम तमाशा ए महफिलों में नचाए थे॥

न जाने वक्त की किस पाटी ने
हम बेजुबानों की तरह हर तरफ घुमाये थे।
हर राह की ठोकरों को सह लेंगे मुस्कुराते-हंसते
पर इलज़ाम झुठे किसी ने हम पर जडाए थे॥
उस पल नब्ज दर नब्ज़
ख़्यालात हमारे बहोत घबराए थे।
होगी कभी उस काली रात की भी भोर
बस विश्वास के दीप मन में जगाए थे॥

वक्त ही तो था वो जिन्दगी का
इसे भूला तो न पायेंगे,
पर खुद को खुदी की नजरों में
बेकसूर करवायेंगे।
हम जो थे बरसों पहले “खेम चन्द”
वो ही सिद्धांत जिन्दगी में फिर अपनायेंगे॥
…. करके नशा होश हमने गंवाए थे

सुना है समय के तमाचे में
आवाज नहीं होती।
बिन सुबूतों के इल्जामों की
नया किसी पर रास नहीं होती॥
यही जिन्दगी है
कभी वक्त तुम्हारा है कभी औरों का
हर पल खुद को साबित करने की बात नहीं होती॥
खुलती है अमावस्या की रात भी आने के बाद,
कुछ पल की तो हमें भी आस नहीं होती।
बता देंगे खुद को सच्चा साबित कराके
कभी वक्त पर सच्चाई भी हमारे साथ नहीं होती॥
…. बिन देखे किसी ने हमपर इल्जाम संगीन लगाए थे

~ खेम चन्द


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