आकर्षण

कभी-कभी आकर्षण को हम प्यार समझने की गलती कर लेते हैं जबकि सत्य कुछ और ही होता है। कलमकार अनिरुद्ध तिवारी आकर्षण के मुद्दे पर चंद पंक्तियाँ इस कविता में प्रस्तुत की हैं।

तुम्हारी नजरों की गुस्ताखियां
आज उलझे एहसासों को जगा गई
वैसे आंखें खूबसूरत है तुम्हारी!
सिर्फ इतना समझ लो
अपरिचित हूं, गैर नहीं!
जैसे खुले आसमान में
चमकते चांद को निहारते हैं सब
आज अनायास ही मन चल पड़ा चांद की ओर
या यूं समझ लो!
प्रेम की पहली सीढ़ी,
जो तुम्हारे आकर्षण से शुरू हुई
ये जो तुम्हारे चेहरे पर जुल्फों का पहरा है!
एहसासों के शब्दकोश में,
नजाकत को ढूंढ रहा हूं मैं
ये जो हल्की सी मुस्कान,
होठों पर दबाई बैठी हो
कभी परिचय हो जाए
तो मैं भी पूछूं!
इस दिल में
कितने किरदार छिपाई बैठी हो?
शायद लिखने को शब्द कम पड़ जाए तुम्हारे लिए
पर तुम्हें जान लूं तो अच्छा है!
मैं भी देखूं!
ये प्रेम कितना सच्चा है!

~ अनिरुद्ध तिवारी


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