वसुन्धरा भी रोई

विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों और धरती माता को जो क्षति पहुँचायी जा रही है उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है। अब वक्त आ गया है कि हम सभी इस ओर ध्यान केंद्रित करें। खेम चन्द ने अपना अनुभव हम सभी से इस कविता के जरिए प्रकट किया है।

धरती माँ की पीठ पर नासमझी वाला भार देखा,
हर कण-ए-मिट्टी को भी हवा, पानी, पशु-पक्षी के साथ
इंसान की गलतियों का शिकार देखा।
पर्वतीय स्थलों को तो छोड दो,
मैंने बिमारी से परेशान वसुंधरा को
रोते सात समंदर पार देखा।

जिज्ञासु हुआ मन तो सवाल पुछा
माँ रोने की क्या वजह-ए-हाल पुछा,
वसुंधरा ने भी सुन्दर शब्दों में जवाब दिया
आप सबकी गलतियों से
आज मेरा कोई भी भाग नहीं है अछूता।
रोयेंगें कभी जरूर तुम संतान मेरी,
क्यों मेरी समस्याओं को जानने से है नजरें फेरी।

बहुत ज्यादा बोझ का भार देखा,
एक खुद उठाने की कोशिश की तो
माँ के लिये दूसरा बोझा तैयार देखा।
कहीं पोलिथिन तो कहीं पर कचरा बेहिसाब देखा
रोई आँखें जब बोतल वो कांच देखा,
माँ कराहती रहीं और बच्चों ने
माँ के बदन का आंच न देखा।
पीने योग्य जल का बहुत कम भण्डार देखा,
जल रहे हैं जंगल हर साल बहुत सा अंगार देखा।

अजब गजब का तुम्हारा विकास देखा,
टेढ़ी मेढ़ी सड़कों का जाल देखा।
बच्चो ने मेरे लिये बनाया है जो स्वर्ग,
वो सुनसान पाताल देखा।
मेरी वेदना को समझे कोई
ऐसी बातों का खाली भरा वो तलाब देखा,
सुगन्ध होती है फूलों की जैसे
बदबू सा बदन पे कूड़े कचरे का गुलाल देखा।

खुद सज्जा संवारने में लगे रहे,
मेरी सजावट का कैसा अकाल देखा।
पशु-पक्षी का स्नेह भरा साथ देखा,
मेरी हर जरूरत में उन सबको पास देखा।

~ खेम चन्द

हिन्दी बोल इंडिया के फेसबुक पेज़ पर भी कलमकार की इस प्रस्तुति को पोस्ट किया गया है।https://www.facebook.com/hindibolindia/posts/402771833963328

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