हमारे पर्यावरण का महत्वपूर्ण हिस्सा है- वन। पंक्षियों और जानवरों की न जाने कितनी प्रजातियाँ विलुप्त हो गईं और कई लुप्त होने के कगार पर हैं। जंगलों संरक्षण हमारा कर्तव्य है – यही संदेश कलमकार खेम चन्द अपनी कविता के माध्यम से दे रहे हैं।

सभी साथ मिलकर करो सहयोग,
पोलीथीन को ज्यादा मत करो उपयोग।
कितना बाकि है मानव तेरा प्रयोग,
बढते ही जा रहे दिन व दिन तेरे उद्योग।
सुन्दर पेड-पौधों की है छटा निराली,
दिखती नहीं अब वो कहीं हरियाली।
आग लगाकर कर रहे हो मेरी संपदाओं का समूलनाश,
पाताल से लेकर अंधेरा है आकाश।
हमारे बगैर किस काम का चारों तरफ प्रकाश।
रसायनों की अनगिनत निकाल रहा तु किस्म,
क्यों बिगाड़ रहा है तु मेरा जिस्म।
रोज किये जा रहे मुझे बचाने के लिए विचार विमर्श,
बातें फूकी बैठी है वो अर्श।
जब होंगें जंगल तभी होगी जीवनदायिनी ऑक्सीजन प्यारी,
मिटा कर वन क्यों कर रहा सर्वनाश की तैयारी।
विलुप्त दिन दर दिन हो रहा मेरा परिवार,
सड़क निकाल कर चलती रहेगी कार,
पौधारोपण ही है वचाव का उपचार।
मृदा अपरदन और भूस्खलन का हममें निचोड़,
पक्का कितना है देख मेरी जड़ों का जोड़,
जब जलता हूँ मैं यूं ना मुझसे नाता तोड़।
असंख्य प्राणियों का मुझमें बसेरा,
न कर मानव उनकी जिन्दगी में अंधेरा।
वनों को नष्ट कर बना रहा अपना ड्रीम प्रोजेक्ट,
आने वाली पिढी की संभावनाओं को क्यों
खुद ही कर रहा है रिजेक्ट।

~ खेम चंद

हिन्दी बोल इंडिया के फेसबुक पेज़ पर भी कलमकार की इस प्रस्तुति को पोस्ट किया गया है।
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