कलमकार अजय प्रसाद जी ने अपनी सुपुत्री अंशु प्रसाद की एक कविता हम सबसे साझा की है। बहुत अच्छा लगता है जब नई पीढ़ी भी साहित्य में रूचि दिखाती है। आइए इस नन्हे कलमकार की स्वरचित पंक्तियाँ पढें।

जीने की आश हैं नफ़रत
किसी की तलाश हैं नफ़रत ।
जो रात को सोने ना दे
जो चैन से मरने ना दे
उसी तबाहि का इन्तज़ार हैं नफ़रत ।

दिल को चीर के जो जाये
चेहरे से मुसकान जो हटाए
हँसी को जो उसकी
बर्बादी बनाए ।
आग दिल में जो लगाए
वो शै हैं नफ़रत ।

बेहद खराब हैं ये नफ़रत
किसी की मौत का नंगा नाच
भी हैं ये नफ़रत ।
तो दिल को पथर भी
बनाती हैं नफ़रत ।
दिल को आराम पहुंचाती
हैं ये नफ़रत।।
हँसी को आसुओं
में बदलती
भी हैं ये
नफ़रत ।

-अंशु प्रसाद


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