अपने ही बनाए जाल में, फँस रहा है आदमी।
अपनों को ही नाग बनकर, डस रहा है आदमी।

प्रकृति को हानि पहुँचाकर भूल रहा है मतवाला,
अपनी ही सांसों पे शिकंजा कस रहा है आदमी।

भौतिक सुख के पीछे ही भागता रहा तमाम उम्र,
आज उन्हीं संसाधनों में झुलस रहा है आदमी।

एकाधिकार की चाह में महामारी है द्वार खड़ी,
आदमी की हरकत पर आज हंस रहा है आदमी।

विज्ञान पर कर भरोसा आँख मीचकर बेहिसाब,
विकासवाद के दलदल में, धस रहा है आदमी।

इसमें ढूँढा उसमें ढूँढा ना जाने किस किस में ढूँढा,
आदमी ही आदमीयत को तरस रहा है आदमी।

दो रोटी अरु दो गज भूमि, बांकी सब कुछ मिथ्या है,
फिर भी एक दूसरे को बहुत ग्रस रहा है आदमी।

पता नहीं किस अन्जानी सी चाह के पीछे पागल है,
बनकर लावा कायनात पर बरस रहा है आदमी।

भौतिकता को आध्यात्म के सर्वदा ही ऊपर रक्खा,
आज उसी भौतिकता में उमस रहा है आदमी।

~ रूपेन्द्र गौर


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