डॉ. राजेश पुरोहित आज के माहौल और इंसान की आदतों को संबोधित करते हुए यह कविता लिखी हैं आइए पढ़ें।

कितनी ही मुश्किलें उठाता है आदमी
घर से जब जब बाहर निकलता आदमी

महँगाई आसमान छू रही है खा नही सकता
थाली से गरीब का प्याज तक नसीब नही है

आम आदमी गरीबी बेरोजगारी से त्रस्त है
आम आदमी का जीवन कितना व्यस्त है

युवाओं के चेहरे हताशा से उदास लटके है
उनमे न जोश न खरोश है पिचके गाल है

चौबीस घण्टे उनके हाथों चल दूरभाष है
आज का आदमी खोखले रिश्तों से जी रहा

इंसानियत धीरे धीरे खत्म होती जा रही है
आज का आदमी खुदगर्ज़ी में जी रहा है

पाप करता जा रहा आज आदमी देखो
खुदा के ख़ौफ़ से भी अनजान है आदमी

~ डॉ. राजेश पुरोहित


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