स्त्रियों को मासिक धर्म के दौरान कई प्रकार की तकलीफें झेलनी पड़ती है। कुछ स्थानों पर उन्हे अनेक सुविधाओं से वंचित रहना पड़ता है। जैसे हम साँस लेते हैं और यह क्रिया जीवन में होनी ही है उसी तरह मासिक धर्म भी एक प्रकिया है। इस आधार पर भेदभाव करना उचित नहीं है। कलमकार खेम चन्द ने इससे जुड़े हुए पुरानी रीति-रिवाजों को समाज से समाप्त करने की बात कही है।
कैसा ये मेरा समाज है?
कैसा झुठा इसका रीति ए रिवाज है?
युगों-युगों की कहानी है
रूढ़िवादी विचारधारा पर पसरा पानी है।
नौ माह जिस कोख में रहकर संसार में आया
उसी कोख का धर्म मासिक धर्म ईक निशानी।क्यों समझा जाता है मासिक धर्म पर बेगाना
आखिर इतना कमजोर क्यों है जमाना।
समझो वेदना सर्दी की, कैसे ठंड में
माँ, बहन और हमारी जीवन संगिनी ने
रात सर्द बाहर गुजारी होगी।
शायद उसके हौसलों ने मासिक धर्म की वेदना पर
वेदों की परत पर लिखी बात पुकारी होगी।
बदल डालो अब ये सोच पुरानी
मासिक धर्म की है अपनी निशानी।मंदिरों में रोका वेदों में रोका
आखिर आंखों पर किस बात का हमारी धोखा है।
इक आस है इक विश्वास है बदलेगी ये विचारधारा
क्योंकि माँ-बहन हम सबके पास है।
सब कुछ औरतों पर उतार दिया
मासिक धर्म पर कैसा रूढ़िवादी विचारों का है वार किया।
प्रभु भी वो ही, मसीहा भी वो ही
बदलेगी तस्वीर ये आस है टोही है।~ खेम चन्द
हिन्दी बोल इंडिया के फेसबुक पेज़ पर भी कलमकार की इस प्रस्तुति को पोस्ट किया गया है।
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