जो दिखाई देता है वह वास्तविकता नहीं है, वास्तविकता जानने के लिए आपको उस इंसान व चीज़ को बहुत करीब से समझना होगा। कलमकार दिव्यांगना की एक कविता पढ़िए जो इस विषय और जानकारी प्रदान कर रही है।

तुम अगर आज के दौर में बैठे हो,
कमरे के किसी अंधेरे कोने में,
मोबाइल लैपटॉप लिए,
चला रहे हो अंधाधुन सोशल मीडिया,
वास्तविकता को भुलाकर,
उपस्थित हो,
उस काल्पनिक सी दुनिया में,
जहां ना तो कोई किसी का अपना है,
ना तुम किसी के अपने हो,
उस ढोंगी इसी दुनिया में,
ठग हजारों हैं और ठगाते लाखों हैं ,
जानते तो तुम सब हो, पर..
तुम लाचार हो अपनी आदतों से,
जी रहे हो, उस पल भर की काल्पनिक सी दुनिया में,
जो कुछ मिनटों में, सारी वास्तविक खुशियां छीन ले जाएगी,
हां! तुम्हें यह भी पता है,
यह सब मोह माया है,
तो क्या ?
सच में तुम अपनी आदत से लाचार हो,
क्या तुमने खुद को अनफ्रेंड कर,
मतलबी दुनिया को फ्रेंड बना लिया है,
तो इससे पहले कि देर हो जाए,..
सुनो…
उस कमरे के अंधेरे कोने से निकलकर
कलरव करते चिड़ियों की चहचहाहट,
देखो….
सुबह की उस सुनहरी किरणों को
रंग बिखेरते आसमानों में,
सीखो…
उस बेजुबान से, जो बोल नहीं सकते हैं,
पर इंसानों से ज्यादा समझते हैं,
और, उस कली से,
जो कांटों में रहकर भी मुस्कुराना नहीं भूलती,
महसूस करो…..
इस वास्तविक खुशी को,
जो दिल को सुकून देती है….!!

~ दिव्यांगना कुमारी


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