हमारी मुलाकात अजनबियों से होती हैं और वे करीबी बन जाते हैं। कलमकार अनिरुद्ध तिवारी ने एक कविता प्रस्तुत की है जिसमें उन्होंने किसी अजनबी का जिक्र किया है।

जब दूर से देखा था तुमको
पता नहीं था!
इतनी समझदार हो तुम!
बड़े संकोच मन से हमने बाते शुरू की थी,
ना तुमने, ना मैंने नाम पूछा था,
हां! एक शब्द बड़ा प्रसिद्ध था हम दोनों के बीच
अजनबी!
जब ट्रूकाॅलर पे तुम्हारा नाम आया था न!
दिल को तसल्ली हुई थी,
चलो नाम तो जाना।
पर स्त्री के मन को समझना,
इतना आसां नहीं होता,
मैंने कहा था उसे।
अजनबी से बात करना अच्छी बात नहीं,
पर वो मानने वालों में से नहीं थी,
मेरे कविताओं और शायरी में,
वो खुद को ढूँढने लगी थी!
वो प्रेम को दबाई बैठी थी,
सिर्फ मेरे अनुमति का इंतजार था उसे।
वो अपने एहसासों और जज्बातों को,
बताने के लिए व्याकुल थी।
हमारे वार्तालाप की गाड़ी
बड़ी सलीके से व्हाट्सएप पर चल रही थी
हम आज तक एक दूसरे से ना मिले
न मिलने की इच्छा जाहिर की,
वो आज भी सबकुछ मान बैठी है मुझे
आज भी व्हाट्सएप पर कहती है मुझसे
मुझे आप समझ नहीं पाए।
मैं भी अपने परिस्थितियों को भांपकर
उसे कहता हूं
मेरे लिए आज भी तुम ‘अजनबी’ ही हो।

~ अनिरुद्ध तिवारी


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