मज़दूर है बहुत मजबूर

समाज का एक महत्वपूर्ण अंग है ये जिसे हम मज़दूर शब्द से नवाज़ते है, कई क़िस्मों का है ये मज़दूर। बस नज़र आपकी है कि किस मोड़ पर वो सोच बैठे कि हाँ ये है मजबूर माफ़ी चाहूँगा ‘मज़दूर’। आइए इस कविता से जोड़ते हुए आपको मज़दूर दिवस की बधाइयाँ देता हूँ…….

हाँ मज़दूर है वो, बहुत मजबूर है वो
हुआ पैदा जहाँ वो, क़िस्मती कमजोर है वो,
पसीना उसका बहता है, ज़िल्लत भी वही सहता
नसीबे छाँव कहा उसको, चिलकती धूप उसकी है
झुर्रियाँ भी उसी की है, कालिमा भी उसी की है
फावड़ा भी उसी का है, दिहाड़ी भी उसी की है
बीमारी भी उसी की है, लाचारी भी उसी की है
हो आपदा कैसी भी, दुशवारी भी उसी की है
हैं रहता मौन फिर भी वो, मिशाले सब्र भी वो है
उफ़्फ़ तक भी नहीं करता, सीमाएँ भी नही लँघता
पसीना खून करता है, कभी ज़ाहिर नही करता
वो साहब सब को कहता है,कभी शिकवा नही करता
तुम्हारी डाँट सहता है, दुआ फिर भी तुम्हें देता
हाँ मज़दूर है वो…
रोटी एक बनती है, टुकड़े चार होते है
खाते है सभी हँस कर, उनके भी परिवार होते है
आँसू सुख जाते है, इच्छाएँ दफ़न हो जाती
सपने कहाँ उनके है, पंख उनके कहाँ होते।
साज़िश कर नही सकते, बग़ावत हक़ नही उनका
जब आया वोट का मसला, तभी तो ध्यान उनका है
बोल कुछ वो नही सकते, हाँ में हाँ मिलानी है
कहाँ कुर्सी में बैठा वो, धरा में बैठ जाता है
हाँ मज़दूर है वो …
लड़ा कब वो, हक़ की ख़ातिर, मिला जो उसको हक़ समझा
वो भी सोच लेता है कि, हूँ मज़दूर ही आख़िर
वो भी सोच लेता है कि, हूँ मज़दूर ही आख़िर

~ भरत कुमार दीक्षित
अधिवक्ता, उच्च न्यायालय, लखनऊ


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