कभी इंटे उठाता।
कभी तसले,
मिट्टी के भर-भर ले जाता।

पीठ पर लादकर,
भारी बोझे,
वह चंद सिक्कों के लिए,
एक मजदूर,
कितना मजबूर हो जाता।

ना सर्दी,
ना गर्मी से घबराता।
मजबूरी का,
फायदा ठेकेदार उठाता।

इतने पैसे नहीं मिलेंगे।
मन मारकर,
जो देना है
दे दो मालिक,
कह कर चुप रह जाता।

मजदूर अपनी,
मेहनत का,
आधा हिस्सा भी ना पाता।
कितना मजबूर होकर रह जाता।‌।

~ प्रीति शर्मा “असीम “


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